Monday, November 9, 2009

सूरज की किरणों के साथ, थोडी देर

कल से फिर
दुनिया और उसके खुदाई खिद्मात्गारों के प्रति
मेरी गालियाँ
तथा
भाग्य और उसपर मेरी मजबूर विश्वास को निकली
मेरी बद-दुआएं -
स्वयं और अपनी तमाम अच्छाईओं की ओर
मेरा अविश्वास
एवं
कर्म और फल के साथ उसकी गैर-मौजूद
रिश्ते-दारी -
कल से फिर इन बातों पर
और बातों के मंथन से मन के लगातार
कुत्ते जैसी रात-भर, रुक-रुक रोने पर –
ज़ंग छिडेगी, जलाएगी, राख कर जायेगी
योग-चिह्न से परिपूर्ण देश और समाज में
घटने की ये रंजिशें
अकेली रह जायेगी

ये सब कल तक हो रहा था
और कल से फिर चालू होगा

बीच का एक दिन, आज,
सूरज की कुछ किरणें
कुछ पल मेरे पास बैठी थी
इसलिए
टूटी हुई सड़कें बड़ी अपनी सी लग रही है,
तमाम लाचारियों और नासमझियों के नाम
बौराया मन
एक माफीनामा ढूँढ रहा है