Thursday, November 27, 2008

Ye main hoon?

मानो मैं तुम्हे कुछ आशाएं दे सकता,
केले के कोमल हरे पत्ते में लपेटकर
thhodi सी उम्मीद – नरम गरम इडली जैसी ;
बचपन में माँ की उंगलिओं जैसा भरोसा
एक बहुत पुराने प्रेमी के मुस्कान सा ठहराव
मानो मेरा साथ सिर्फ़ सासों और किस्सों का होता,
हाड़ – मॉस - आँसू – बीर्य की घनिष्ठ
अनिश्चितताओं से परे,
किसी जिहादी के ज़न्नत सा अनिवार्य
मानो मैं दरवाज़े के बाहर परे कुत्ते सा
जो देते, सो खाता, बेमतलब पूंछ हिलाता,
पर दरवाज़ के अन्दर की ज़िन्दगी को
अपना मांगकर
भूले से भी कभी न चिल्लाता
फिर क्या हवाएं थोडी धीमी बहती?
बारिश सारी वहाशिआना छोड़कर
धागे के पतले संयम सा
रिम-झिम ……….

Tapan 28.11.08

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