Sunday, August 9, 2009

Airport

आज, इस वक्त,
सोडा बोत्तल के बुलबुलों सा
जिंदा एक हवाई अड्डे पे
मैं अपने साथ बैठा हूँ.
मैं हूँ,
भीड़ में मिलने वाली
वह अदभुत सी तन्हाई है
पर साथ कोई किताब नही है.
ऐसा आम-तौर पर होता नही है
की मैं एक भरे पुरे किताब की दूकान का
चार चक्कर लगाऊं
और सारे शब्द हलके, सौ बार कहे
मेरे सच से सदियों दूर
बस कोरे शब्द लगे
जैसे की चीटियाँ सफ़ेद चादर पर
रेंगती हुई, दस, सौ, हज़ार...
और मैं ऐसा
खामोश दिमाग और जुबान लिए, अकेला
अपने आप को पढूं,
कुछ पन्नो पर हंसूं

और ढेर सारे पर आँसू
गले से निकलकर
सीने में गहरे डूबें
नासूरों को नमक सा
लहू लुहान....

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