Sunday, August 9, 2009

Chaand

सूरज की किरणों से भीगा
दुनिया की परछाई से भागा
आज रात इस पूर्ण चंद्र को
मैं अपने घर से, सड़क से
देख रहा हूँ
और इसी चाँद को तुम
जो मेरे अपने हो
मेरे अज़ीज़, मेरे दोस्त
और जिन्हें मैं जानता भी नही
वोह अरबों, जिन्हें बिना जाने
मेरी ज़िन्दगी राज़ी खुशी बीत जायेगी -
वोह जिनके हंसने, रोने से
मुझे फर्क parta है
और जिनके समंदर में समां जाने से
या वह्शीआना गोलियों से गाँव पे गाँव --
मुझे कोई फर्क नही परता ,
वोह जो इस काव्यिक पलायन को समझेंगे,
और जो इसी किसी तरह झेलेंगे

वोह सब, सारे
अपनी अपनी दुनिया से
देशों से
शहरों से
गाँव से
घरों से
इसी चाँद को
देख रहे होंगे

और शायद कहीं
येही चाँद
एक और कविता को
जन्म लेने पर मजबूर कर रहा होगा

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